मन धुंद वाऱ्या सवे उडते क्षितिजावर मन पाखरू होऊन देते नभास अलिगण पाहण्या मनाचे चाळे जीव होतो आतुर नकळत तू माझ्या अवती भासतो पाहुनी मग मला गाली हसतो कधी कळणार मी तुला याची वाट पाहतो -kitkat
मुक्कदर की लकीरोको हम खुद ही मिटा बैठे है ढुढने निकले थे उजाला पर खुद ही अंधेरा कर बैठे है मानते है गलतीया की है हमने पर संभलना भी खुदसे हि सिखा है जिंदगी के रास्तो पर मूडना भी खुद ही से सिखा है मानता हु रास्ते मुश्कील है पर संभल जायेगे हम खुद ही खुद को संभलं लेंगे हम -kitkat